मैं कलम से कलम मुझसे नहीं ...मैं तो एक तुच्छ सेवक बनके दवी हुई आवाज़ छुपे हुए पहलुओ की पहल बनना चाहती हूँ। अंधेरे को मिटाने के लिए एक दिया ही काफ़ी है मेरे विचारो से प्रभावित एक व्यकि्त ने भी मेरी सोच का समर्थन किया तो मेरा जीवन सार्थक हो जायेगा । दीपों की पक्ति जुडके कब दिवाली बन जायें ये पता नहीं । मेरा उद्देश्य देश की सेवा करना है जिसमें प्रभु ने चुनाव किया है मैं तो साधारण हूँ सोच असाधारण हो सकती है पर मक़सद एक है देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाना सब अपने अपने क्षेत्र में योगदान देते है शायद यही मेरा योगदान हो।